क्या आप जानते हैं कि मरने के बाद आत्मा सबसे पहले कहाँ जाती है ? कहाँ होता है आपके सारे जीवन के पाप पुण्यों का हिसाब ? कहाँ सुनाई जाती है पापियों को नरक की सज़ा ? कहाँ से आदेश होता है आत्मा को स्वर्ग या नरक जाने का ?
आज आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताते है जहाँ अगर आप जीवन में कभी नहीं गए तो मरने के बाद तो एक बार जाना ही पड़ेगा। क्यूंकि मान्यता है कि मृत्यु होते ही यमदूत आत्मा को यहाँ लाते है और यहीं लगती है धर्मराज या यमराज की कचहरी | भरमौर के इस चौरासी मंदिर में चित्रगुप्त आपके पूरे जीवन का लेखा जोखा यहीं खोलते है। यहीं आपके कर्मों का होता है हिसाब और फिर आपके कर्मों के हिसाब से आत्मा को भेजा जाता है स्वर्ग या नरक।
चंबा के भरमौर स्थित शाम चौरासी में पूरी दुनिया का यमराज का इकलौता मंदिर है। यहां साक्षात देवी-देवताओं का वास माना जाता है। यह मंदिर बाहर से देखने में बिलकुल आम नजर आता है, लेकिन इसकी मान्यता सबसे अनूठी है। कहा यह भी जाता है कि इस मंदिर में चार अलग-अलग धातु के अदृश्य दरवाजे भी हैं। यह द्वार सोना, चांदी, तांबे और लोहे से बने हुए हैं। गरुड़ पुराण में भी यमराज के दरबार में चार दिशाओं में चार द्वार का उल्लेख किया गया है।
इस मंदिर की स्थापना के बाबत किसी को भी सही जानकारी नहीं है। बस इतना जरूर है कि चंबा रियासत के राजा मेरू वर्मन ने छठी शताब्दी में इस मंदिर की सीढिय़ों का जीर्णोद्धार किया था। इसके अलावा इस मंदिर की स्थापना को लेकर अभी तक किसी को भी जानकारी नहीं है। मान्यता है कि धर्मराज महाराज के इस मंदिर में मरने के बाद हर किसी को जाना ही पड़ता है। चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक। इस मंदिर में एक खाली कमरा है जिसे चित्रगुप्त का कमरा माना जाता है।
सदियों पूर्व चौरासी मंदिर समूह का यह मंदिर झाडिय़ों से घिरा था और दिन के समय भी यहां कोई व्यक्ति आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। मंदिर के ठीक सामने चित्रगुप्त की कचहरी है और यहां पर आत्मा के उल्टे पांव भी दर्शाए गए हैं। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां पर अढ़ाई पौढ़ी भी है। मान्यता है कि अप्राकृतिक मौत होने पर यहां पर पिंड दान किए जाते है। साथ ही परिसर में वैतरणी नदी भी है, जहां पर गौ-दान किया जाता है। इसके अलावा धर्मराज मंदिर के भीतर अढ़ाई सौ साल से अखंड धूना भी लगातार जल रहा है।
चंबा जिले में भरमौर नामक स्थान में स्थित इस मंदिर के बारे में कुछ बड़ी अनोखी मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर के पास पहुंच कर भी बहुत से लोग मंदिर में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। मंदिर के बाहर से ही हाथ जोड़कर चले जाते हैं।
पवित्र मणिहेश यात्रा के विभिन्न पड़ाव अपने चमत्कारों के चलते इस यात्रा को अन्य यात्राओं से भिन्न करते हैं। मान्यता के अनुसार पवित्र भरमाणी माता के दरबार में हाजिरी न भरने वाले श्रद्धालु की यात्रा संपूर्ण नहीं मानी जाती। ऐसे में पवित्र मणिमहेश यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु सर्वप्रथम माता भरमाणी के दर्शन करने पहुंचते हैं। भरमाणी माता मंदिर में माता के दर्शन करने के उपरांत पवित्र कुंड में दर्शन करने के बाद ही यात्रा मणिमहेश की आगामी यात्रा को आरंभ करते हैं।
चंबा मुख्यालय से 62 किलोमीटर दूर भरमौर आज धार्मिक नगरी के साथ-साथ पर्यटन नगरी के लिए भी विश्व विख्यात हो रहा है। भरमौर मतलब मणिमहेश यात्रा। पौराणिक मान्यताओं की बात करें तो गुप्त गंगा का यहां पर मंदिर है चित्रगुप्त कि यहां पर किताब है माता लखना का मंदिर भी यहां पर मौजूद है। कहते हैं कि 84 परिसर में चौरासी मंदिर मौजूद है उसके नीचे स्वयं गंगा नदी बहती है।
