HP High Court’s major decision on damages caused by four-lane construction: Compensation will now be based on ‘actual losses’, not ‘estimates’.
शिमला ( Shimla ) हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फोरलेन परियोजनाओं के निर्माण के दौरान अधिगृहीत (Acquired) सड़क सीमा से बाहर की संपत्तियों को होने वाले नुकसान के मुआवजे को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसी संपत्तियों के लिए मुआवजा केवल अनुमानों या काल्पनिक सूत्रों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता; यह पूरी तरह से वास्तविक नुकसान (Actual Loss) के मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए।
‘अधिग्रहण’ और ‘क्षति’ के मुआवजे में अंतर
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने एनएचएआई (NHAI) की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जिस जमीन का अधिग्रहण किया जाता है और जिस जमीन को निर्माण के कारण नुकसान पहुँचता है, दोनों के मुआवजे के मापदंड अलग-अलग होते हैं।
अदालत ने कहा, “किसी काल्पनिक सूत्र का उपयोग करके मुआवजा देना कानूनी रूप से मान्य नहीं है। अधिग्रहण के मामलों में मुआवजे के निर्धारण के लिए कई घटकों पर विचार किया जाता है, लेकिन परियोजना निर्माणकर्ता की चूक से होने वाले नुकसान के लिए समान सूत्र नहीं अपनाया जा सकता।”
संपत्ति मालिक का अधिकार बरकरार
हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस संपत्ति का अधिग्रहण नहीं हुआ है, उसका मालिक उस जमीन का निरंतर स्वामी और कब्जेदार बना रहता है। वह उस जमीन का उपयोग अपनी इच्छानुसार किसी भी उद्देश्य के लिए कर सकता है। इसलिए, मुआवजे का निर्धारण यथार्थवादी होना चाहिए और सक्षम निकाय द्वारा नुकसान के सटीक आकलन पर आधारित होना चाहिए।
क्या था मामला?
यह मामला सोलन जिले से जुड़ा है, जहाँ एनएचएआई की फोरलेन परियोजना के कारण सड़क सीमा से बाहर की निजी संपत्तियों को नुकसान पहुँचा था।
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समिति का फैसला: डीसी सोलन की अध्यक्षता वाली समिति ने प्रभावितों को ₹1,03,81,160 का मुआवजा देने की सिफारिश की थी।
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NHAI की आपत्ति: एनएचएआई ने इस मूल्यांकन से असंतुष्ट होकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट के कड़े निर्देश: विशेषज्ञों से कराएं जांच
हाईकोर्ट ने सोलन समिति की पिछली सिफारिशों को रद्द करते हुए मामले की पुनः सुनवाई के आदेश दिए हैं। अदालत ने निर्देश दिए कि:
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विशेषज्ञों की मदद: निजी प्रतिवादियों की संपत्ति को हुए वास्तविक नुकसान का आकलन विशेषज्ञों के माध्यम से कराया जाए।
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उपयोगिता की जांच: यह जांचा जाए कि क्या सुधारात्मक उपायों के बाद संपत्ति का उपयोग किया जा सकता है या वह हमेशा के लिए अनुपयोगी हो गई है।
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समय सीमा: समिति को इस पूरी प्रक्रिया को पूरा कर 28 फरवरी 2026 तक नया कार्यवाही विवरण (Proceedings) तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
