चम्बा रुमाल का नाम तो अपने जरूर सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों चम्बा रुमाल इतना खास है आखिर एक रुमाल इतना मशहूर क्यों ? तो आज हम इस आर्टिकल में आपको यह बताने जा रहे कि आखिर क्या बनाता है चम्बा रुमाल को ख़ास…
सबसे पहले चंबा रुमाल के नाम की बात करें तो नाम हिमाचल प्रदेश के जिला चम्बा से आता है और चम्बा रुमाल के बनाने के इतिहास की बात करें तो कहा यह जाता है, कि इसका वर्णत 16वीं शताब्दी में शुरू होता है | सिखों के गुरु, गुरु नानक देव जी की बहन ने इसे सबसे पहले बनाया था और उनका बनाया रुमाल आज भी ऐतिहासिक धरोहर के रूप में होशियारपुर गुरुद्वारे में रखा गया है। कहा यह भी जाता है कि 17 वीं शताब्दी में राजा पृथ्वी सिंह ने चम्बा रुमाल की कला को अधिक संवारा और रुमाल पर दो रूखा टांका कला शुरू की, उस समय चम्बा रियासत में आम लोगों सहित शाही परिवार भी चम्बा रुमाल की कड़ाई करते थे, लेकिन अब धीरे धीरे यह धरोहर विलुप्त होने लगी है।
हालाँकि चम्बा रुमाल के डिमांड की बात करें तो ना सिर्फ देश बल्कि विदेशो तक इस रुमाल की डिमांड रहती है | 250 रूपए की कीमत से शुरू होने वाली राशि 30 हज़ार तक भी पहुँच जाती है और कीमत अधिक होने का कारण इसे बनाने में लगने वाला 25 से 30 दिन का समय है और उससे भी महत्वपूर्ण इस पर की जाने वाली कढ़ाई, यह डिज़ाइन इतनी बारीक और खूबसूरत हैं कि देखने वाले की नज़र इन्हीं पर टिकी रहे। अक्सर ही चम्बा के रुमाल पर श्री राधा और श्री कृष्ण की रास लीला से जुड़े डिज़ाइन देखने को मिलते हैं, रेशम के रंगीले धागों से कॉटन और खड़ी के कपड़ों पर किया बारीक काम बेहद मनमोहक लगता है | इसीलिए अक्सर कई राजनीतिक मौकों पर भी चम्बा का रुमाल भेंट स्वरूप भी दिया है।
विलुप्त हो रही इस कला को बचाने के फिलहाल कई कदम उठाये जा रहे हैं चम्बा रुमाल का इस्तेमाल अब उतना आम तो नहीं लेकिन यही चम्बा रुमाल को अलग बनाता है।
