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बिजली महादेव, माता पार्वती व गणेश दे रहे भक्तो को दर्शन, 7 दिनों तक एक साथ रहता है परिवार

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जिला कुल्लू ढालपुर मैदान में अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव की धूम मची हुई है। तो वहीं सैकड़ों देवी देवता भी यहां अपने अस्थाई शिविरों में विराजमान हुए हैं। रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं के देवी देवताओं के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं। तो वही भगवान शिव के परिवार के भी एक जगह पर ही भक्तों को दर्शन हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में भाग लेने के लिए खराहल घाटी से बिजली महादेव पधारे हैं। तो वहीं मणिकर्ण घाटी से भी माता पार्वती यहां विराजमान हुई है। इसके अलावा उझि घाटी से भी भगवान गणपति भी अपनों के साथ यहां पहुंचे हैं और तीनों देवी देवता एक साथ भक्तों को दर्शन दे रहे हैं। ढालपुर अस्पताल के समीप शिविर में हर दिन भजन कीर्तन व दूर दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भोजन की भी व्यवस्था होती है। शिव शक्ति  के दर्शन करने  हर दिन हजारों श्रद्धालु आ रहे हैं और अपनी मनोकामना लेकर शीश नवाने आते हैं।  हर दिन सुबह इनके शिविरों में परंपरा के अनुसार पूजा अर्चना की जाती है और रात के समय आरती की जाती है।
भगवान बिजली महादेव का मंदिर खराहल घाटी में स्थित है। जबकि माता पार्वती मणिकर्ण घाटी के चोंग गांव में अपने मंदिर में विराजमान रहती है। भगवान गणपति उझी घाटी के घुड़दौड़ गांव में अपने मंदिर में विराजमान रहते हैं। वही कार्तिक भगवान मनाली के सिमसा गांव में विराजमान रहते हैं। इन देवताओं के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं को अलग-अलग इलाकों का रुख करना पड़ता है। लेकिन दशहरा उत्सव में 7 दिनों तक भगवान बिजली महादेव, माता पार्वती, भगवान गणेश एक जगह पर श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं।
बिजली महादेव के शिविर में हर दिन वाद्य यंत्रों के साथ पूजा व आरती होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हिमाचल दौरे के दौरान बिजली महादेव का हर बार जिक्र करते हैं और यहां पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रोपवे का भी निर्माण किया जाना है।
मणिकर्ण घाटी की आराध्य माता पार्वती जोड़ियां भी बनाती है और जिन दंपती के बच्चे  नहीं होते हैं। वो भी अपनी इच्छा लेकर पार्वती माता के दरबार में आते हैं और माता उनकी हर इच्छा पूरी  करती है। गणेश भगवान की मान्यता  है कि शिव शक्ति से पहले गणेश के दर्शन करने होते हैं। उसके बाद ही माता पार्वती व बिजली महादेव के दर्शन करने होते हैं।
देवता बिजली महादेव के पुजारी तीर्थ राम का कहना है कि खराहल घाटी में भी श्रद्धालु इन के दर्शनों को पहुंचे और सावन माह में विशेष रुप से भी यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है। दशहरा उत्सव में भी भगवान 7 दिनों तक यहां विराजे हैं और श्रद्धालुओं की मनोकामना को पूरी कर रहे हैं।
तीनों देवी देवताओं के दर्शन करने आए श्रद्धालु देवेंद्र कुमार व नरेंद्र जमवाल का कहना है कि साल के बाकी समय इनके दर्शनों के लिए अलग-अलग इलाकों का रुख करना पड़ता है। लेकिन अच्छी बात है कि दशहरा उत्सव में तीनों देवी देवता एक ही स्थान पर विराजे रहते हैं। जिससे श्रद्धालुओं को भी एक जगह पर ही इन देवी देवताओं के दर्शन करने की सुविधा मिल पाती है। वही दशहरा उत्सव में जिला कुल्लू के विभिन्न इलाकों से भी देवी देवता आते हैं और एक जगह पर ही सभी देवी देवताओं के दर्शन हो रहे हैं।

विश्व के सबसे बड़े देव महाकुंभ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा पर्व में सोमवार को ढालपुर मैदान पहुंचे सभी देवी-देवताओं ने रघुनाथ जी के अस्थाई शिविर में जाकर हाजरी भरी। यही नहीं सभी देवी-देवताओं का रघुनाथ जी के रजिस्टर में बाकायदा एंट्री होने के बाद अठारह करोड़ देवी-देवताओं का देव महामिलन हुआ। इस देव महामिलन को मुहल्ला कहते है। इसके पश्चात देवी-देवताओं के दशहरा पर्व में सोमवार देर रात रघुनाथ के दरबार में शक्ति का आह्वान होगा। दशहरा पर्व में इस शक्ति आह्वान को विधिवत रूप से किया जाएगा। मुहल्ला पर्व में सबसे पहले देवी हडिंबा माता फूलों का गुच्छा जिसे शेश कहा जाता है। उसके मिलने पर ही मुहल्ला पर्व शुरू होता हैं। मुहल्ला पर्व में रघुनाथ के पुजारियों ने बाकायदा देवताओं के नाम रजिस्टर में दर्ज किए। इसमें सबसे पहले हिडिंबा देवी का नाम दर्ज होता है। इस दौरान देवी-देवता राजा की चानणी के पास भी हाजरी देते हैैं और देवी-देवताओं से लिया गया फूल रूप में प्रसाद राज गद्दी पर बिठाए जाएँगे तथा राजा अपनी राजगद्दी को छोड़कर साधारण कुर्सी पर बैठेगेंं। वहीं देर रात को   शक्ति का आह्वान होता है। परंपरा के अनुसार शक्ति रूपी ब्राह्मण रघुनाथ जी के समक्ष शेर की सवारी में नंगी तलवार से नाचते हुए अढ़ाई फेरे लगाती है। इस दिन लंका पर विजय के लिए शक्ति से रक्षा की अपील की जाती है। कुल्लू दशहरा पर्व अनूठी परंपरा का संगम है। शेष विश्व में दशहरा पर्व समाप्त होता है तथा कुल्लू में शुरू होता है। इसके पीछे धारणा यह है कि रावण पूर्णिमा के दिन मारा गया था। इसलिए कुल्लू का दशहरा पर्व पूर्णिमा से सात दिन पहले शुरू होता है तथा सातवें दिन लंका दहन में रावण को परंपरा अनुसार भेदा जाता है। बहरहाल छठे दिन कुल्लू के समस्त देवी-देवता रावण का सफाया करने के लिए मुहल्ला में एकत्र होते हैं और शक्ति का आह्वान

करके सातवें दिन लंका पर चढ़ाई करेगें।

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